साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी, रँग रीझ कौ माच्यौ। भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट बूड़िबे को काहू कर्म न बाच्यौ। भेष न सूझ्यो, कह्यो समुझ्यौ न, बतायो सुन्यो न, कहा रुचि राच्यौ। 'देव' तहाँ निबरे नट की बिगरी मति को सिगरी निसि नाच्यौ।।
हिंदी समय में देव की रचनाएँ